Wednesday, 11 May 2016

कपारफोडवा - the guy who hit the old lady

कपारफोडवा  - जब भी इस घटना के बारे में सोचता हु तो बहुत ही ज्यादा हसी आती है।  बचपन में कैसे कैसे पागलपन किये हैं।  आज कोई मिले मुझसे तो सोचेगा कितना सज्जन पुरुष हुँ। लेकिन बचपन की बात ही कुछ अलग थी।  हमेसा मस्ती और धमाल का मन रहता था और उसपर से किसी दिन अगर स्कूल में जल्दी छुट्टी हो गई तो फिर क्या कहना।  वैसे ही किसी दिन में से एक दिन था।  स्कूल में आकस्मिक छुट्टी घोषित हो गया।  ठीक तरह से कुछ याद नहीं but  शायद कोई इवेंट था और इसलिए १० -११ पूर्वाह्न को छुट्टी घोषित  कर दी गई। सारा दिन बचा हुआ था।  क्रिकेट खेलने के प्लान्स स्कूल में ही बन ने लगे।  माताजी ने लंच के लिए मीठी रोटी बन कर टिफ़िन में दिया था. मेरी मनपसंद थी, खुश था , लेकिन अचानक हुई छुट्टी लंच से पहले थी।  सोचा पहले खा लेता हु फिर घर जाऊंगा।  इस समय दृश्य पटल पर हमारे बड़े भाई की एंट्री जरुरी है।  हम दोनों भाई एक ही कक्षा में पढ़ते थे।  शायद मई जितना शांत था वो उतने ही नटखट।  उनका साम्राज्य चलता था नतखतबजी में।  उनकी उम्र के और उनसे छोटे बच्चे काफी डरते थे उनसे।  दर नाम की चीज़ नहीं थी उनमे , इसलिए किसी से भी लड़ने में नहीं डरते थे।  खैर हुआ ये की टिफीन बॉक्स उनके बैग में था और वो जिद पर अड़ गए की घर जाकर टिफ़िन खाएंगे।  मई नहीं मानने वाला था।  मैंने जिद पकड़ ली की स्कूल में ही खाऊंगा लेकिन शायद उनको डर  था की हमलोग अगर खाने बैठे तो सारे दोस्त हमलोगो को छोड़कर घर प्रस्थान कर जायेंगे और साथ ही साथ स्कूल से वैसे ही उन्हें लगाओ नहीं था ;-) इस बात पर हमदोनो में झगड़ा होने लगा।  बता बहस से चालू हुई।  बचपन में अपनी कुटिल जुबान के लिए मई infamous था।  उचित , अनुचित एंड सही गलत को जज करने की मास्टरी हासिल कर राखी थी मैंने, इसलिए कितने ही दफा घर में मेरी ढंग से कुटाई भी हो राखी थी।  पर मैं भी काम जिद्दी नहीं था।  दोनों भाइयों के बहस ने हाथापाई का रूप लिया।  बड़े भाई साहब न केवल नटखट थे , बल्कि स्पोर्ट्स में भी काफी आगे थे।  १०० मीटर रेस में स्प्रिंटर हुआ करते थे।  और ताक़त में भी मुझसे ज्यादा।  खैर उन्होंने मुझे धक्का मर और दौड़ कर भागने लगे। उनके लिए ये सब मज़ाक मस्ती चल रही थी लेकिन मई गुस्से में लाल पिला हो गया था।  उनको पकड़ने की कोसिस की लेकिन वो हिरन की तरह छलांग मरते भाग निकले स्कूल गेट से बाहर। स्कूल से थोड़ी दूर पर हाईवे गुजरती थी और हमलोगो को वो क्रॉस करना पड़ता था।  भाई साहब दौड़ते हुए हाईवे क्रॉस कर गए और मई पीछे छूट गया।  मैंने उनको सबक सीखने की सोची। मैंने हाथ में एक ईटा उठा लिया और उनको डरने लगा लेकिन वो निडर , डरे नहीं।  मैंने अनुमान लगे की मई अगर ये ढेला फेकू तो उनके पैर के पास गिरेगी और पैर में लगेगी इसलिए मैंने फेक मारा।  उसके बाद असली घटना घटी।  जैसे ही मैंने ढेला फेंका, मेरे ठीक सने एक बुढ़िया खड़ी हो गई और ढेला सीधे उसके लिलाट पर जाकर लगा। और छर छर करके उसके माथे से खून की धरा बहने लगी।  लोग जमा हो गए , बुढ़िया ने मेरा हाथ पकड़ लिया  भी नहीं पाया।  शायद थोड़ा दर भी गया था।  तुरत बुढ़िया को हमारी स्कूल के दवाखाने में लाया गया और डॉक्टर सिस्टर ने उनकी मरहम पट्टी कर दी।  मेरे ऊपर से लोगो का ध्यान थोड़े समय के लिए हट गया, इस घटना के बाद मेरे भाई साहब भागे नहीं , मेरे साथ हो लिए।  मन में थोड़ा सुकून था की मेरा बड़ा भाई है मेरे साथ।  लेकिन बहार लोग पीटेंगे ये सोचकर डर भी लग रहा था।  हॉस्टल में रहने वाले लड़के झूठी अफवाह उड़कर हम दोनों  भाइयों को डरा रहे थे की गओंवले स्कूल के बहार है।  जैसे ही  हम लोग बहार जायेंगे स्कूल के,हमलोगो को पकड़ लेंगे।  फिर जैम कर हमारी मरम्मत करेंगे।  बयान नहीं कर सकता उस समय कैसी मनो  दशा थी.हमलोगो को प्रिंसिपल सिस्टर ने स्कूल के अंदर ही रोक लिया था।  बोल घर से कोई आएगा तब जाना , अकेले मत जाओ।  हम दोनों भाई  हाथ पकडे २-३ घंटे बैठे रहे।  लंच  का समय हो गया था , स्कूल में ही वो मीठी रोटी खाई हमलोगो ने, लेकिन उसमे वो मज़ा नहीं था , बस बुख लगी इसलिए खाया था।  मुझे उस दिन जीवन का एक बड़ा सबक मिला था , किसी भी चीज़ की आतुरता में या आवेश में कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए और गलत कदम तो कभी भी नहीं उठाना चाहिए।  साथ में ये भी भरोसा हो गया था की मेरा भाई कभी नहीं साथ छोड़ेगा।  इस घटना के बाद काफी दिनों तक स्कूल जाने में डर  लगता था , दोस्तों की  भीड़ में छुप  कर स्कूल में एंट्री करता था।  बुढ़िया और उसके घर वालो का डर लगता था की  वो पकड़ कर मेरी मरम्मत करेंगे।  जब भी उस घटना को याद करता हु तो हसी  आ जाती है। 

बचपन की यादें

पिछले कई दिनों से अपने गुजरे हुए कल की यादें जेहन में आ रही है।  खुद ही बैठे बैठे हसने लगता हु, कुछ चीजों को याद कर दुःख भी होता है. कुल मिलकर कर देखू तो बचपन बहुत ही eventful रहा  बोले तो रोचक रहा है।  शायद आज के बच्चों को वो हसीं पल नसीब न हो पाएगा।  एक प्रयास करना चाहता हुँ।  अपने बचपन की उन साड़ी यादो को समेटना चाहता हूँ और साथ ही साथ इंटरनेट की इस बृहत् दुनिया में सबके सामने  रखना चाहता हूं।  शायद कुछ लोग अपने आप को उन स्मृतिओं से जोर पाएंगे और उसी बहने अपने बचपन को याद कर खुश हो पाएंगे।  अगर मेरे जीवन की इन स्मृतिओं को पढ़ कर किसी के भी चेहरे पे एक छोटी सी मुश्कान आ जाएगी तो खुद को बहुत धनि मानूंगा। कुछ ऐसी भी समृत्य भ होंगी जिन्हे बयां करने में मुझे संकोच होगी , शायद ये सोच कर की लोग क्या सोचेंगे और क्या राय बनाएंगे मेरे बारे में. लेकिन i  थिंक i  हैवे तो मूव ऑन फ्रॉम व्हाट पीपल थिंक।   हिंदी में लिखना थोड़ा  कठिन हो गया है।  पहले अंग्रेजी  के नाम से हवा टाइट हो जाती थी।  अब हिंदी में लिखने और सोचने में कठिनाई होती है।  देखें तो ये उन्नति का असर है लेकिन अगर समझे तो महसूस होगा की अपनी ही भाषा से दूर होते गए है और उसको प्रोग्रेस का नाम दे रहे है।  बहुत कठिन है ये justify  करना की हमने उन्नति की या अवनति।  खैर ये सब मन का अंतार्द्वन्द है।  यह सदैव चलता ही रहेगा - क्या खोया क्या पाया।  आसमान में उड़ने की ख्वाहिश थी।  उड़ते उड़ते इतने ऊपर आ गए की ज़मीन धुंधली हो गई।  पहले रिश्तों को enjoy करते थे।  अब किसी तरह निभाने की कोशिश।  शायद ये भी वो एक कोशिश है।  जगजीत सिंह जी आज हमारे बिच नहीं रहे।  लेकिन कॉलेज के समय सुने गए उनकी कुछ ग़ज़लों के बोल आज भी कानो में गूंजते है - ये दौलत भी लेलो , ये सोहरत भी लेलो, चाहे चिन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो मेरा वो बचपन , वो कागज को कश्ती , वो बारिश का पानी।  शायद उनको ये बातें बहुत पहले समझ में आ गई थी।  आज तक एकांत में लिखता था , सर्फ अपने लिए, लेकिन अब ये प्रयास है की सब तक अपनी कहानी पहुंचो, शायद कुछ लोग मेरी कहानी में, मेरे बचपन में अपना बचपन देख ले, याद कर ले।  बहुत उत्साह और समय की जरुरत होगी।  बहुत ही ज्यादा सहयोग और प्रोत्साहन चाहिए होगा।  अगर मेरी इन पंक्तिओं में से कोई एक शब्द भी आपको छू जाये तो जरूर उत्साहित करियेगा।  आपके कमेंट्स पढ़कर प्रोत्साहन होगा , लगेगा की शायद बचपन का कोई भुला बिसरा दोस्त मिल गया।